प्राकृतिक खेती

प्राकृतिक खेती

प्राकृतिक खेती

 

संदर्भ

      • नीति आयोग की ओर से प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए आनलाइन कार्यशाला का आयोजन किया गया।

प्राकृतिक खेती

      • प्राकृतिक खेती(Natural Farming) कृषि की प्राचीन पद्धति है।
      • यह भूमि के प्राकृतिक स्वरूप को बनाए रखती है। प्राकृतिक खेती में रासायनिक कीटनाशक का उपयोग नहीं किया जाता है।
      • इस प्रकार की खेती में जो तत्व प्रकृति में पाए जाते है, उन्हीं को खेती में कीटनाशक के रूप में काम में लिया जाता है।
      • प्राकृतिक खेती में कीटनाशकों के रूप में गोबर की खाद, कम्पोस्ट, जीवाणु खाद, फ़सल अवशेष और प्रकृति में उपलब्ध खनिज जैसे- रॉक फास्फेट, जिप्सम आदि द्वारा पौधों को पोषक तत्व दिए जाते हैं।
      • प्राकृतिक खेती में प्रकृति में उपलब्ध जीवाणुओं, मित्र किट और जैविक कीटनाशक द्वारा फ़सल को हानिकारक जीवाणुओं से बचाया जाता है।

प्राकृतिक खेती की आवश्यकता

      • पिछले कई वर्षों से खेती में काफी नुकसान देखने को मिल रहा है। इसका मुख्य कारण हानिकारक कीटनाशकों का उपयोग है। इसमें लागत भी बढ़ रही है।
      • भूमि के प्राकृतिक स्वरूप में भी बदलाव हो रहे है जो काफी नुकसान भरे हो सकते हैं। रासायनिक खेती से प्रकृति में और मनुष्य के स्वास्थ्य में काफी गिरावट आई है।
      • किसानों की पैदावार का आधा हिस्सा उनके उर्वरक और कीटनाशक में ही चला जाता है। यदि किसान खेती में अधिक मुनाफा या फायदा कमाना चाहता है तो उसे प्राकृतिक खेती की तरफ अग्रेसर होना चाहिए।
      • खेती में खाने पीने की चीजे काफी उगाई जाती है जिसे हम उपयोग में लेते है। इन खाद्य पदार्थों में जिंक और आयरन जैसे कई सारे खनिज तत्व उपस्थित होते है जो हमारे स्वास्थ्य के लिए काफी लाभदायक होती है।
      • रासायनिक खाद और कीटनाशक के उपयोग से ये खाद्य पदार्थ अपनी गुणवत्ता खो देते है। जिससे हमारे शरीर पर बुरा असर पड़ता है।
      • रासायनिक खाद और कीटनाशक के उपयोग से जमीन की उर्वरक क्षमता खो रही है। यह भूमि के लिए बहुत ही हानिकारक है और इससे तैयार खाद्य पदार्थ मनुष्य और जानवरों की सेहत पर बुरा असर डाल रहे है।
      • रासायनिक खाद और कीटनाशक के उपयोग से मिट्टी की उर्वरक क्षमता काफी कम हो गई। जिससे मिट्टी के पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ गया है। इस घटती मिट्टी की उर्वरक क्षमता को देखते हुए जैविक खाद उपयोग जरूरी हो गया है।

प्राकृतिक खेती के फायदे

      • कृषकों की दृष्टि से लाभ

        • भूमि की उपजाऊ क्षमता में वृद्धि हो जाती है।
        • सिंचाई अंतराल में वृद्धि होती है।
        • रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होने से लागत में कमी आती है।
        • फसलों की उत्पादकता में वृद्धि।
        • बाज़ार में जैविक उत्पादों की मांग बढ़ने से किसानों की आय में भी वृद्धि होती है |

        मिट्टी की दृष्टि से

        • जैविक खाद के उपयोग करने से भूमि की गुणवत्ता में सुधार आता है।
        • भूमि की जल धारण क्षमता बढ़ती है।
        • भूमि से पानी का वाष्पीकरण कम होगा।

        पर्यावरण की दृष्टि से

        • भूमि के जलस्तर में वृद्धि होती है।
        • मिट्टी, खाद्य पदार्थ और जमीन में पानी के माध्यम से होने वाले प्रदूषण में कमी आती है।
        • कचरे का उपयोग, खाद बनाने में, होने से बीमारियों में कमी आती है।
        • फसल उत्पादन की लागत में कमी एवं आय में वृद्धि
        • अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्पर्धा में जैविक उत्पाद की गुणवत्ता का खरा उतरना।

कृषि कानून निरसन विधेयक को मंजूरी

कृषि कानून निरसन विधेयक को मंजूरी

कृषि कानून निरसन विधेयक को मंजूरी

संदर्भ?

      • शीतकालीन सत्र के पहले दिन कृषि कानून निरसन विधेयक, 2021 को संसद के दोनों सदनों ने बिना बहस के पारित कर दिया गया।
  • कृषि कानून
      • किसान उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020।
      • मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तीकरण और संरक्षण) समझौता अधिनियम, 2020।
      • आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020
  • विरोध का कारण
      • इन अधिनियमों के लागू होने के बाद किसानों द्वारा इनमें शामिल कई मुद्दों जैसे-न्यूनतम समर्थन मूल्य का उल्लेख न होना, कृषि उपज विपणन समिति (APMC) के प्रभाव को सीमित करने के साथ अधिनियम में प्रस्तावित विवाद निस्तारण प्रणाली को लेकर भी प्रश्न उठे हैं।
      • केंद्र सरकार के अनुसार, ‘मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तीकरण और संरक्षण) समझौता अधिनियम, 2020’ किसानों को विपणन में स्वतंत्रता प्रदान करने का प्रयास करता है।
      • इस उद्देश्य के लिये यह अधिनियम किसी प्रायोजक (किसान के साथ कृषि समझौते में शामिल कोई व्यक्ति, फर्म, कंपनी आदि) के साथ लेनदेन के दौरान किसानों के हितों की रक्षा करने का प्रावधान करता है।
      • किसानों की सुरक्षा के अन्य प्रावधानों के साथ यह भुगतान के लिये प्रायोजक के उत्तरदायित्व का निर्धारण करता है और प्रायोजक को लिखित समझौते के माध्यम से किसान की भूमि या परिसर के स्वामित्व को लेने या भूमि में कोई स्थायी बदलाव करने से रोकता है।
      • हालांकि किसानों के हितों की रक्षा के इन प्रावधानों की प्रभावशीलता इनको लागू करने के संस्थान की शक्ति तथा उसकी कार्यप्रणाली पर ही निर्भर करेगी और इस अधिनियम के तहत निर्धारित विवाद निस्तारण प्रणाली (सुलह एवं समझौते पर आधारित) अधिक प्रभावी नहीं प्रतीत होती है।

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